Pages

February 7, 2011

MY POEM


नशा है नाश 
नशे में नही शान, यह भली-भाँति जान, 
सुन खोल के कान, यह है बीमारियों की खान, 
तू है मेजबान, यह है मेहमान, 
मान ना मान, यह छीनेगा पहचान, 
पाना है सम्मान,सुधार खान-पान, 
क्यों है अनजान, यह लेगा जान, 
देनी ही है जान, तो देश पर हो कुर्बान, 
ना हो परेशान, नशा मुक्ति ठान|| 
                            -जतिन  गर्ग "बादल"

No comments:

Post a Comment